एक परिंदा उड़ने को था !

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कल ही तो तिनका जोड़ा था ,चुन के एक सुरक्षित कोना ,

पेड़ की ऊंची डाली पर , बनाया एक घोंसला छोटा था।

 

चौकन्नी और सतत सतर्क , वह रहती थी निगरानी में ,

पंखों से ढांके अपने स्नेह पुंज को, नन्हा चिड़ा जब आया था।

 

चोंच में लाती जीवन रस भर कर , आहार बना उसे सिंचित करती ,

वह जो अस्तित्व आधार बना था , निर्भर उसपर ही जो था।

 

कब- कैसे यूँ बड़ा हुआ – वह किंचित ही विस्मय में थी ,

आनंदित मन प्राण था फिर भी ,कोना ह्रदय का डरता था।

 

प्रकृति ने उसे फिर समझाया, प्रवाह अविरल है जीवन का ,

ऐसे ही तुम भी आयी थी, और फिर उड़ना सीखा था।

 

समझ गयी वह जीवन रीत , ह्रदय प्रफुल्लित , मन आनंदित ,

‘नन्हा चिड़ा’ परिंदा बन , नयी उड़ान भरने को था।

©Aradhana Mishra

 

14 Replies to “एक परिंदा उड़ने को था !”

  1. These days heart is having mixed emotions n your poetry says it all.True n perfect description of each n every mothers feelings whose child is ready to fly 😊

    1. Thank you Parul! You have been one encouraging soul for me and my words ! Coming to the ‘feelings’, it’s kinda mixed and I believe every parent goes through this at some point of time but then we learn to live with it !
      Much love

  2. एक अति विशिष्ट रचना……पढ़कर मन किंचित् उद्वेलित हो उठा!
    संवेदनाओं के समुद्र से उठी इन सूक्ष्म तरंगों और उनके स्पंदन को बड़ी ही तीव्रता और संजीदगी से महसूस कर रहा हूँ ।
    शैशवावस्था व युवावस्था तक के वात्सल्य प्रेम तथा संघर्ष और जीवन-समर को अग्रसर अपने नन्हे के प्रति आतंकित मन के अंतर्द्वंद्व ……और फिर नियति के समक्ष समर्पण को बयां करती एक बेहद खूबसूरत दासताँ ……कहीं हम सबकी ही कहानी तो नहीं!!!!
    रचनाकार को शत् शत् नमन!
    The message is loud & clear…..be the caring parents,nurture the offspring with utmost love & affection,but never stymie their natural growth and never crush them under the weight of your expectations.
    Let them fumble,stumble and then summon the strength on their own to rise again to find their way to destination through the labyrinthine mess of life.
    After all you won’t be there for ever to serve as the guiding beacon…..the inevitable truth of life will catch up with you sooner or later!

    1. आतंकित की जगह आशंकित पढने का कष्ट करें ।
      Typo-error….so bad!

    2. “Your children are not your children.
      They are the sons and daughters of Life’s longing for itself.
      They come through you but not from you,
      And though they are with you yet they belong not to you.”
      These famous lines by Khalil Gibran practically sums up how we should treat our children! They should not be treated as ‘investment for old age’ and neither should they be treated as the tool to fulfill our unrealized dreams! we are just the medium through which life keeps flowing! At best we are the nurturers, the guiding force, as you have rightly said.
      पर इतना समझने के बाद भी ह्रदय में अगर अंतर्द्वंद है तो जान लेना चाहिए कि ये मातृ ह्रदय है जो समझ के भी नहीं समझना चाहता ! एक बार फिर से आपके सुन्दर शब्दों के लिए आपका आभार ! भाषाओं पर आपकी पकड़ उत्कृष्ट है और पढ़ने वाले के लिए आनंद प्रदान करने वाला। आशा है भविष्य में भी यह ‘भाषा- निधि’ इसी प्रकार मुझे कृतज्ञ करती रहेगी !

    1. Hello Keerti,
      Thank you for your kind words! Knowing you has been one of the best experiences of my life!

  3. हम सबके जीवन की भावपूर्ण अभिव्यक्ति !! मॉं के स्नेह और वात्सल्य से पूर्ण हृदय की भावनाओं को इस समय तुमसे बेहतर कौन समझेगा!! अपने चूज़े को पंख पसारकर उड़ता देख चिड़िया ही सबसे अधिक गर्व महसूस करती है …💕

    1. सस्नेह आभार आपके शब्दों के लिए ! अगर आपके लिखे शब्द पढ़ने वालों की भावनाओं को भी अभिव्यक्त करे तो रचना की सार्थकता एक अलग ही आयाम को छूती है। और आपने उचित कहा कि अपने चूज़े को पंख पसारता देख चिड़िया ही सबसे अधिक गर्व महसूस करती है।
      PS Didn’t know you are so good with Hindi as well!

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