प्रकृति

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मेघों की टोकरी में आया था उपहार उसका,

धनक की करधनी और बारिश की बूंदों के झुमके, 

लरजते  झरनों के साथ अटखेली करती,

संदेसा भेजा था उसने किरणों के रथ से। 

 

व्याकुल थी वह- कितने  दिन और मास थे बीते,

करना था श्रृंगार उसे- अब चैन नहीं दिन-रात, 

जल बिन सूनी उसकी बगिया- किस कर करे श्रृंगार, 

रीती सी फिरती थी- अब स्वप्न हुआ साकार। 

 

फूलों के संग सजे कभी,  बना बंसन्त को प्रियतम,

पतझर में ढूंढें संगी, राग-रंग से ऊब कभी,

चपल सी प्रकृति है यह- बदले ढंग हर मौसम, 

धानी चूनर ओढ़ चली, बादल है अतिप्रिय अभी। 

6 Replies to “प्रकृति”

  1. वाह,अति सुंदर।
    आपकी हिंदी भी उतनी ही उत्कृष्ट है जितनी आपकी अंग्रेजी ।
    शब्दों का सटीक और विलक्षण चयन तथा सार-गर्भित विषय-वस्तु का आलंकारिक चित्रण … दोनों ही मापदंडों पर खरी उतरती एक मनभावन कविता का सृजन आपके कर-कमलों द्वारा।
    Can I have the liberty to call it a product straight from the beauty parlour….
    ……and did anyone get the feel of petrichor emanating after the soft drizzle,as I did!!!

    1. धन्यवाद ! 🙂 आपके शब्दों ने पुनः मुझे अपनी रचना पर मान करने के लिए बाध्य कर दिया -तात्पर्य यह कि अगर प्रशंसा इतनी सुन्दर है तो रचना संभवतः अच्छी ही होगी ! 🙂
      And yes, you surely have the liberty to call it a product straight from the beauty parlour ! 😀
      I am feeling rather ecstatic to know that my words did make someone get the feel of petrichor…!

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